लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले विधान परिषद (एमएलसी) की 11 सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद भाजपा प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार कर रहे हैं, वहीं सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी चुनावी रणनीति बनाने में जुटे हैं। सपा की ओर से अंतिम समय में दो प्रत्याशियों को बदले जाने से इस चुनाव की अहमियत और बढ़ गई है।
शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की इन 11 सीटों पर मुकाबला दोनों प्रमुख दलों के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लगातार जनसभाएं कर प्रत्याशियों के पक्ष में समर्थन जुटा रहे हैं। गोरखपुर और बरेली के बाद वाराणसी में भी उनकी जनसभा प्रस्तावित है। वहीं, समाजवादी पार्टी के नेता और पदाधिकारी विभिन्न जिलों में सक्रिय होकर अपने प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार कर रहे हैं।
भाजपा और सपा के लिए क्यों अहम है चुनाव?
राजनीतिक दृष्टि से इन चुनावों को विधानसभा चुनाव से पहले दोनों दलों की तैयारियों और जनसमर्थन का आकलन करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के बेहतर प्रदर्शन के बाद पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव तक अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखना चाहती है। दूसरी ओर, भाजपा की कोशिश विधान परिषद चुनाव में पिछली बार से बेहतर प्रदर्शन कर अपनी स्थिति मजबूत करने की है।
पिछले चुनाव में भाजपा ने 11 में से छह सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार पार्टी की नजर अधिक सीटें हासिल करने पर है। सपा भी अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। यही वजह है कि दोनों दलों के वरिष्ठ नेता चुनाव प्रचार और संगठनात्मक बैठकों में सक्रिय हैं।
बैलेट पेपर से मतदान, इसलिए भी बढ़ी दिलचस्पी
इन चुनावों की अहमियत बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। पहला, मतदान बैलेट पेपर के माध्यम से होना है। ऐसे में चुनाव परिणाम को लेकर भाजपा और सपा, दोनों की राजनीतिक रणनीति पर नजर रहेगी। हालांकि, इस चुनाव के नतीजों के आधार पर ईवीएम से होने वाले चुनावों की निष्पक्षता के बारे में सीधे निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
दूसरा कारण मतदाताओं का वर्ग है। इन सीटों पर शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के पंजीकृत मतदाता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे। पढ़े-लिखे और पेशेवर वर्ग से जुड़े मतदाताओं का समर्थन हासिल करना दोनों दलों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
तीसरा कारण इन सीटों का भौगोलिक विस्तार है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल तक फैले निर्वाचन क्षेत्रों के कारण चुनाव का दायरा कई जिलों तक पहुंचता है। ऐसे में परिणामों को राजनीतिक दल अपने संगठनात्मक प्रभाव और मतदाताओं के रुझान के संकेत के रूप में देख सकते हैं। हालांकि, विधान परिषद चुनाव के नतीजे विधानसभा चुनाव के परिणामों का निश्चित अनुमान नहीं देते।
पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव
एमएलसी की 11 सीटों में पांच स्नातक और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों की सीटें शामिल हैं। स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ और इलाहाबाद-झांसी शामिल हैं। वहीं, शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद और गोरखपुर-फैजाबाद सीटों पर चुनाव होना है।
स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में लखनऊ खंड के अंतर्गत लखनऊ, हरदोई, लखीमपुर खीरी, रायबरेली, सीतापुर, उन्नाव, बाराबंकी, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर जिले आते हैं। वाराणसी खंड में वाराणसी, चंदौली, गाजीपुर, जौनपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र, भदोही और बलिया शामिल हैं।
आगरा खंड में आगरा, अलीगढ़, एटा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, मथुरा, हाथरस, कासगंज, इटावा, फर्रुखाबाद, कन्नौज और औरैया के मतदाता शामिल हैं। मेरठ खंड में मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बुलंदशहर, हापुड़, बागपत, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और शामली जिले आते हैं। इलाहाबाद-झांसी खंड में प्रयागराज, कौशांबी, फतेहपुर, बांदा, चित्रकूट, हमीरपुर, महोबा, झांसी, जालौन और ललितपुर शामिल हैं।
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में भी कड़ा मुकाबला
शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में लखनऊ, वाराणसी और आगरा खंड के अंतर्गत संबंधित स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की तरह ही कई जिले शामिल हैं। मेरठ खंड में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नौ जिले आते हैं, जबकि बरेली-मुरादाबाद खंड में बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, पीलीभीत, मुरादाबाद, अमरोहा, बिजनौर, रामपुर और संभल शामिल हैं।
गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का विस्तार भी व्यापक है। इसके अंतर्गत गोरखपुर, महाराजगंज, देवरिया, कुशीनगर, बस्ती, सिद्धार्थनगर, संत कबीर नगर, अयोध्या, अंबेडकर नगर, गोंडा, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, आजमगढ़, मऊ और अमेठी समेत निर्धारित क्षेत्र शामिल हैं।
नतीजों पर रहेंगी राजनीतिक दलों की निगाहें
कुल 11 सीटों पर होने वाले इस चुनाव में भाजपा और सपा के लिए अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने का अवसर है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का प्रचार अभियान और अखिलेश यादव की चुनावी रणनीति इस मुकाबले को खास बना रही है। अब सबकी निगाहें मतदान और मतगणना के नतीजों पर रहेंगी, जिनसे विधान परिषद में दोनों दलों की स्थिति स्पष्ट होगी।




