बसपा सुप्रीमो ने X पर रखी राय, कहा- जनता पर बढ़ेगा आर्थिक बोझ, पहले बुनियादी शिक्षा व्यवस्था सुधारे सरकार
लखनऊ, 18 सितंबर (आईपीएन)। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने यूपीआई लेनदेन पर प्रस्तावित शुल्क व्यवस्था और उत्तर प्रदेश में स्मार्ट स्कूल योजना को लेकर केंद्र एवं राज्य सरकार पर सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया मंच X पर किए गए सिलसिलेवार पोस्ट में उन्होंने जनता पर बढ़ते आर्थिक बोझ और शिक्षा व्यवस्था की मूलभूत जरूरतों को लेकर चिंता जताई।
‘UPI शुल्क जनता से दोनों हाथों से वसूली’
मायावती ने कहा कि यूपीआई डिजिटल लेनदेन को पहले बड़े पैमाने पर बढ़ावा देने के बाद अब उस पर शुल्क वसूलने की व्यवस्था जनता की नजर में प्रथमदृष्टया मुनाफाखोरी की सोच को दर्शाती है। उन्होंने कहा कि इससे आम लोगों में बेचैनी और आक्रोश स्वाभाविक है।
‘चाहे शुल्क कहें या कर, जेब तो जनता की कटेगी’
बसपा प्रमुख ने कहा कि जनता इस व्यवस्था को कर मानने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन 15 अक्टूबर से लागू होने वाली इस व्यवस्था को चाहे जो भी नाम दिया जाए, उसका असर सीधे आम लोगों की जेब पर पड़ेगा और उनके खर्च में वृद्धि होगी।
गरीबी, महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा उठाया
उन्होंने कहा कि देश की बड़ी आबादी पहले से ही गरीबी, महंगाई और आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रही है। उनके अनुसार बच्चों और युवाओं के सामने अशिक्षा, बेरोजगारी तथा अव्यवस्था जैसी समस्याएं मौजूद हैं। ऐसे में सरकार की नीतियां लाभ कमाने वाली कम और जनकल्याणकारी अधिक होनी चाहिए।
‘जनता की चिंता सरकार नहीं करेगी तो कौन करेगा?’
मायावती ने कहा कि आम जनता की तंगी, दुख और तकलीफों के प्रति सरकार को संवेदनशील होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि सरकार ही जनता की परेशानियों की चिंता नहीं करेगी तो फिर कौन करेगा।
स्मार्ट स्कूल योजना पर भी उठाए सवाल
बसपा सुप्रीमो ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लगभग 300 करोड़ रुपये की लागत से करीब 14,500 विद्यालयों को स्मार्ट स्कूल बनाने की घोषणा का स्वागत किया, लेकिन इसके क्रियान्वयन को लेकर सवाल भी उठाए। उन्होंने कहा कि स्मार्ट पढ़ाई से पहले स्कूलों में बच्चों के लिए बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की जानी चाहिए।
‘पहले छत, बेंच, किताब और शौचालय की व्यवस्था हो’
उन्होंने कहा कि स्कूलों में बच्चों के सिर पर छत, बैठने के लिए बेंच-कुर्सियां, किताबें, शौचालय, खेल मैदान और साफ-सफाई जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि प्रति विद्यालय लगभग दो लाख रुपये के खर्च में यह सब कितना संभव हो पाएगा।




