नई दिल्ली। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये पर बढ़ते दबाव के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मुद्रा बाजार में स्थिरता लाने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं। केंद्रीय बैंक 12 अक्टूबर 2026 से देश की तीन प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों को डॉलर उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्था शुरू करेगा। इसके साथ ही विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कारोबार में जोखिम और सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने के लिए नियमों को भी सख्त किया गया है।
RBI के इस फैसले का उद्देश्य तेल कंपनियों की डॉलर संबंधी जरूरतों को सीधे पूरा करके खुले विदेशी मुद्रा बाजार पर दबाव कम करना है। नई व्यवस्था अगले आदेश तक लागू रहेगी। इसके तहत इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL), हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) की रोजाना की पूरी डॉलर जरूरत विशेष विंडो के माध्यम से पूरी की जाएगी।
खुले बाजार से डॉलर की मांग घटाने की तैयारी
भारत बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है, जिसके भुगतान के लिए तेल कंपनियों को डॉलर की जरूरत पड़ती है। जब ये कंपनियां खुले बाजार से बड़ी मात्रा में डॉलर खरीदती हैं, तो डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव पड़ सकता है।
इसी स्थिति को देखते हुए RBI ने इन तीनों सरकारी तेल कंपनियों को नामित बैंकों के माध्यम से सीधे डॉलर बेचने का फैसला किया है। इससे उनकी डॉलर संबंधी मांग का एक बड़ा हिस्सा खुले बाजार से हट जाएगा। हालांकि, रुपये की मजबूती पर इसका वास्तविक असर वैश्विक तेल कीमतों, डॉलर की मांग और विदेशी पूंजी के प्रवाह जैसे अन्य कारकों पर भी निर्भर करेगा।
रद्द किए गए फॉरेक्स कॉन्ट्रैक्ट की दोबारा बुकिंग पर रोक
विदेशी मुद्रा बाजार में जोखिम प्रबंधन को मजबूत करने के लिए RBI ने रुपये से जुड़े विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट के नियमों में भी बदलाव किया है। नए निर्देशों के अनुसार, रद्द किए गए ऐसे कॉन्ट्रैक्ट को दोबारा बुक करने की अनुमति नहीं होगी। हालांकि, निर्धारित नियमों के तहत परिपक्वता पर कॉन्ट्रैक्ट को आगे बढ़ाने की सुविधा जारी रहेगी।
इसके अलावा, बैंकों और अधिकृत डीलरों को ग्राहकों से लिखित पुष्टि लेनी होगी कि जिस वास्तविक कारोबारी जोखिम से बचाव के लिए हेजिंग की जा रही है, उसे किसी दूसरे अधिकृत डीलर के साथ भी हेज नहीं किया गया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य एक ही लेनदेन के आधार पर कई जगह हेजिंग करने की संभावना को रोकना है।
100 मिलियन डॉलर की सीमा घटाकर 5 मिलियन डॉलर
RBI ने वास्तविक कारोबारी जोखिम के प्रमाण के बिना कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव लेनदेन करने की मौजूदा सीमा को 100 मिलियन डॉलर से घटाकर 5 मिलियन डॉलर कर दिया है। यह बदलाव अधिकृत डीलरों के माध्यम से होने वाले संबंधित लेनदेन और रुपये से जुड़े एक्सचेंज-ट्रेडेड करेंसी डेरिवेटिव पर भी लागू होगा।
इस कदम से बिना अंतर्निहित कारोबारी जोखिम के बड़े सौदे करने की गुंजाइश सीमित होगी। केंद्रीय बैंक का जोर विदेशी मुद्रा बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने और अनावश्यक जोखिम लेने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने पर है।
20 प्रतिशत नकद रिजर्व का नया नियम
RBI ने ‘फॉरेन एक्सचेंज रिस्क रिजर्व’ (FERR) नाम से एक नई व्यवस्था भी लागू की है। इसके तहत रुपये से जुड़े कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट का सांकेतिक मूल्य 20 लाख डॉलर से अधिक होने पर अधिकृत डीलरों को संबंधित सौदे के रुपये में मूल्य के 20 प्रतिशत के बराबर राशि केंद्रीय बैंक के पास नकद रिजर्व के रूप में रखनी होगी।
यह प्रावधान उन पात्र कॉन्ट्रैक्ट पर लागू होगा, जिनका इस्तेमाल चालू खाते से जुड़े लेनदेन में रुपये के बदले विदेशी मुद्रा खरीदने के जोखिम से बचाव के लिए किया जाता है। इसका उद्देश्य ऐसे सौदों में जोखिम प्रबंधन को मजबूत करना और अत्यधिक विदेशी मुद्रा कारोबार को हतोत्साहित करना है।
रुपये की स्थिरता पर रहेगी नजर
RBI के इन फैसलों से विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर की मांग और डेरिवेटिव कारोबार से जुड़े जोखिम को नियंत्रित करने में मदद मिलने की उम्मीद है। हालांकि, इन कदमों से रुपये को कितनी राहत मिलेगी, यह आने वाले दिनों में बाजार की प्रतिक्रिया और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां रुपये की चाल को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक बने रहेंगे।




