पूर्व सीबीआई निदेशक ने वाराणसी से सर्वजन सनातन पार्टी की कमान संभाली, पूर्व आईएएस दिव्या मित्तल भी यूपी से शुरू करेंगी राजनीतिक सफर
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। बड़े राजनीतिक दलों के साथ-साथ नए चेहरे और नए राजनीतिक मंच भी सामने आने लगे हैं। पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल, सामाजिक कार्यकर्ता रोहिणी घावरी और पूर्व सीबीआई निदेशक एम. नागेश्वर राव की सक्रियता ने चुनावी परिदृश्य में नई चर्चाओं को जन्म दिया है।
इनमें नागेश्वर राव ने वाराणसी से सक्रिय राजनीति में कदम रखने की औपचारिक घोषणा कर दी है। उन्होंने सर्वजन सनातन पार्टी (एसएसपी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभाला है। वहीं दिव्या मित्तल ने भी आईएएस सेवा से अलग होने के बाद उत्तर प्रदेश से अपनी राजनीतिक यात्रा शुरू करने की घोषणा की है। उन्होंने फिलहाल किसी स्थापित राजनीतिक दल में शामिल होने से इनकार किया है।
वाराणसी से नागेश्वर राव की नई राजनीतिक पारी
पूर्व सीबीआई निदेशक एम. नागेश्वर राव ने वाराणसी में आयोजित कार्यक्रम में सर्वजन सनातन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अपनी राजनीतिक भूमिका की घोषणा की। करीब चार दशक तक सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और प्रशासन के क्षेत्र में काम करने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश को अपने सार्वजनिक जीवन की नई जिम्मेदारी बताया।
राव ने पार्टी के विचार और प्राथमिकताओं को भी सामने रखा। उनका कहना है कि ‘सत्य सनातन, नित्य नूतन’ पार्टी का मूल संदेश है। पार्टी शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और सभ्यतागत जुड़ाव जैसे मुद्दों पर जोर देने की बात कर रही है। दिव्या मित्तल भी राजनीति में उतरने को तैयार
पूर्व आईएएस अधिकारी दिव्या मित्तल ने सितंबर के अंत में सक्रिय राजनीति में आने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था कि उत्तर प्रदेश उनकी कर्मभूमि है और यहीं से उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत होगी। उन्होंने किसी राजनीतिक दल के साथ जुड़ने के बजाय सीधे लोगों के साथ काम करने की बात कही है।
मित्तल के चुनाव लड़ने को लेकर भी चर्चाएं हैं, हालांकि उन्होंने अभी किसी सीट की आधिकारिक घोषणा नहीं की है। उनके प्रशासनिक कार्यकाल और उत्तर प्रदेश में विभिन्न पदों पर तैनाती के कारण उनके राजनीतिक कदम पर नजर बनी हुई है।
रोहिणी घावरी की भी बढ़ी सक्रियता
इसी बीच रोहिणी घावरी की उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रियता भी चर्चा में है। विदेश से लौटने के बाद उन्होंने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियां शुरू की हैं। उनकी सक्रियता को खास तौर पर दलित और वाल्मीकि समाज से जुड़े मुद्दों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
रोहिणी घावरी ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक हिस्सेदारी के मुद्दे उठाए हैं। नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के साथ उनके विवाद के कारण भी वह पहले चर्चा में रही हैं। दोनों के बीच लगाए गए आरोपों पर न्यायिक निष्कर्ष अलग विषय है और किसी भी पक्ष के आरोप को अदालत के अंतिम फैसले के रूप में नहीं देखा जा सकता।
छोटे दलों और नए चेहरों की बढ़ती भूमिका
उत्तर प्रदेश में चुनावी मुकाबले से पहले छोटे दलों और नए राजनीतिक समूहों की सक्रियता भी बढ़ रही है। ऐसे दल अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अपना आधार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इससे प्रमुख दलों को सीटवार समीकरणों और गठबंधन की रणनीति पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है।
कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी 2027 के चुनाव को देखते हुए संगठन और सहयोगी दलों के स्तर पर तैयारियां कर रहे हैं। कांग्रेस ने हाल में उत्तर प्रदेश संगठन में बदलाव किए हैं, जबकि सपा के साथ सीट बंटवारे और गठबंधन को लेकर बातचीत का दौर जारी है।
चुनाव तक बदल सकता है राजनीतिक समीकरण
उत्तर प्रदेश में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में प्रस्तावित है। चुनाव से पहले अभी कई राजनीतिक घटनाक्रम सामने आना बाकी हैं। ऐसे में नए राजनीतिक दलों, स्वतंत्र उम्मीदवारों और सामाजिक आंदोलनों की सक्रियता आने वाले महीनों में किस रूप में बदलती है, यह महत्वपूर्ण होगा।
फिलहाल इतना जरूर है कि दिव्या मित्तल की स्वतंत्र राजनीतिक पहल, रोहिणी घावरी की सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता और एम. नागेश्वर राव की नई पार्टी के गठन से यूपी की चुनावी राजनीति में नए विकल्पों की चर्चा तेज हो गई है।




