‘एकात्मता का उत्सव’ कार्यक्रम में संघ की 100 वर्षों की यात्रा, सेवा और हिंदू सभ्यता की दृष्टि पर सरसंघचालक ने रखे विचार
लंदन, 7 सितंबर (आईपीएन)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि दुनिया को बेहतर बनाने के लिए विभाजन के बजाय जोड़ने वाले तत्वों पर जोर देना होगा। उन्होंने कहा कि हिंदू विश्व को संतुलित दृष्टि प्रदान कर सकते हैं और सभी विविधताओं का सम्मान करना ही हिंदू विचार की विशेषता है।
डॉ. मोहन भागवत ने यह विचार 6 सितंबर को यूनाइटेड किंगडम के लंदन में आयोजित ‘Celebration of Oneness’ (एकात्मता का उत्सव) कार्यक्रम के दौरान व्यक्त किए। न्यूयॉर्क में 29 अगस्त और टोरंटो, कनाडा में 31 अगस्त को संबोधन के बाद लंदन में उन्होंने संघ की 100 वर्षों की यात्रा से संबंधित विभिन्न प्रश्नों के उत्तर दिए।
‘अपनापन’ संघ की यात्रा का आधार
संघ के ऐसे तत्व के बारे में पूछे जाने पर, जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है, डॉ. भागवत ने कहा कि यदि एक ही सिद्धांत का उल्लेख करना हो, तो वह ‘अपनापन’ है। उन्होंने इसे सभी के प्रति शुद्ध, सात्त्विक प्रेम बताते हुए कहा कि व्यक्ति, समुदाय, समाज और समूची मानवता के प्रति प्रेम हिंदू का पारंपरिक स्वभाव है।
‘जहां कोई कुछ नहीं कर रहा, वहां संघ सेवा कर रहा’
संघ की सेवा गतिविधियों के संबंध में उन्होंने कहा कि स्वयंसेवक मानव जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सक्रिय हैं, इसलिए उनके कार्य के पूरे विस्तार का सार प्रस्तुत करना कठिन है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक कारणों से विरोध करने वाले लोग भी संघ के कार्य और स्वयंसेवकों के योगदान को स्वीकार करते हैं।
उन्होंने कहा कि समय-समय पर महत्वपूर्ण विषयों पर लोग संघ से सहयोग और संवाद की अपेक्षा करते हैं। यह समाज के विभिन्न वर्गों में संघ के कार्य की व्यापक स्वीकार्यता को दर्शाता है। डॉ. भागवत ने कहा, “जहां कोई कुछ नहीं कर रहा होता, वहां संघ सेवा कर रहा होता है—लद्दाख से लेकर कन्याकुमारी तक।”
सातवीं पीढ़ी आने से पहले संगठन का कार्य पूरा हो
अगले 100 वर्षों के लिए संघ के प्रमुख संदेश के संबंध में पूछे गए प्रश्न पर सरसंघचालक ने कहा कि संघ को आगे भी वही कार्य निरंतर करना होगा, जो उसने अब तक किया है। उन्होंने कहा कि कार्यों को पूरा करने में इतना समय नहीं लगना चाहिए।
उन्होंने कहा कि संघ में अब पांच पीढ़ियां साथ काम कर रही हैं और सातवीं पीढ़ी आने से पहले हिंदू समाज के संगठन का कार्य पूरा हो जाना चाहिए।
‘विविधता हमारा स्वभाव, उसका सम्मान करना होगा’
विश्व के लिए हिंदू सभ्यता के योगदान के संबंध में डॉ. भागवत ने कहा कि सभी हिंदू विचार इस सूत्र पर आधारित रहे हैं कि प्रत्येक कर्म के पीछे कोई कारण है। अस्तित्व वास्तव में एक है, यद्यपि वह विविध दिखाई देता है। उन्होंने कहा कि विविधता हमारा स्वभाव है, इसलिए उसे स्वीकार करना और उसका सम्मान करना होगा।
‘हिंदू राष्ट्र’ और ‘हिंदुत्व’ की अवधारणा से संबंधित प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि हिंदू शब्द को किसी धार्मिक आचरण या जीवन-शैली के आधार पर नहीं समझा जा सकता। हिंदू एक प्रकृति है, जो सभी विविधताओं को स्वीकार करती है और उनका सम्मान करती है। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म की विभिन्न परंपराएं अपनी विशिष्ट दर्शन-पद्धतियों और आचरण के साथ व्यापक हिंदू सभ्यतागत परिवेश में अस्तित्व में रह सकती हैं।
युवा पीढ़ी पर अधिक विश्वास
भविष्य की पीढ़ी की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि उन्हें नई पीढ़ी पर अधिक विश्वास है। उनमें दुनिया को बेहतर बनाने की तीव्र आकांक्षा है और वे छोटे-छोटे मतभेदों से ऊपर उठने को तैयार हैं।
उन्होंने कहा कि युवाओं को उद्देश्य, अनुभव से प्राप्त आवश्यक ज्ञान और दृष्टि प्रदान करनी चाहिए, लेकिन उसे उन पर थोपना नहीं चाहिए। उन्हें अपना मार्ग स्वयं खोजने देना चाहिए।
‘सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए’
भारत के सामने भविष्य की चुनौतियों से निपटने में युवा हिंदुओं की भूमिका के संबंध में डॉ. भागवत ने कहा कि युवा पीढ़ी का दायित्व अपने मूल्यों के अनुसार जीवन जीना है। सेवा के क्षेत्र में भी यही भाव होना चाहिए।
उन्होंने कहा, “सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। सेवा ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिससे आप महान बनते हैं। यह उपकार नहीं है।” उन्होंने कहा कि सेवा ईश्वर के निकट जाने का अवसर है और जिनकी सेवा की जा रही है, वे सेवा का अवसर देकर उपकार करते हैं।
‘कर्मभूमि में रहकर उसकी सेवा करनी है’
ब्रिटिश हिंदुओं की निष्ठा के संबंध में पूछे गए प्रश्न पर सरसंघचालक ने कहा कि यदि ब्रिटिश हिंदू अच्छे, पक्के और सच्चे हिंदू हैं, तो ब्रिटेन और भारत के हितों के बीच कभी कोई संघर्ष नहीं होगा। उन्होंने कहा कि आपकी कर्मभूमि ही वह स्थान है, जहां आपकी निष्ठा होती है।
उन्होंने कहा कि जन्मभूमि आपकी उत्पत्ति या जन्म का स्थान है और पुण्यभूमि वह स्थान है, जहां से आपको अपने मूल्य प्राप्त होते हैं। इन मूल्यों को अपनी कर्मभूमि में जीना और जिस भूमि पर रहते हैं, उसकी सेवा करना चाहिए।
‘हमें क्या जोड़ता है, इस पर जोर होना चाहिए’
हिंदुओं के एकजुट न होने की धारणा तथा एकता के सार के संबंध में पूछे गए प्रश्न पर डॉ. भागवत ने कहा कि मानव समाज में विविधता स्वाभाविक है। हमें इसके साथ चलना है, लेकिन अपना जोर इस बात पर होना चाहिए कि हमें क्या जोड़ता है, न कि इस बात पर कि हमें क्या विभाजित करता है।
उन्होंने कहा कि यदि ऐसा किया जाएगा, तो समुदाय, समाज समृद्ध होगा और दुनिया एक बेहतर स्थान बनेगी।
600 लोगों ने लिया भाग, 326 संगठनों का प्रतिनिधित्व
कार्यक्रम का संचालन यूनाइटेड किंगडम निवासी वेलनेस विशेषज्ञ ममता सुब्रह्मण्यम ने किया। हिंदू स्वयंसेवक संघ, यूनाइटेड किंगडम (HSS UK) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 600 लोग उपस्थित रहे, जिन्होंने 326 संगठनों का प्रतिनिधित्व किया।
कार्यक्रम में हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य, हाउस ऑफ कॉमन्स के सांसद, मेयर, काउंसिलर्स तथा यूनाइटेड किंगडम में भारत के उच्चायुक्त पेरियासामी कुमारन, उप उच्चायुक्त कार्तिक पांडे सहित समुदाय के अन्य प्रमुख नेता उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत नेपाल में आई बाढ़ के कारण जान गंवाने वाले लोगों तथा विस्थापित परिवारों की स्मृति में मौन रखकर हुई। इस दौरान बताया गया कि Sewa UK ने नेपाल में राहत कार्यों के लिए अंशदान के माध्यम से 1,00,000 पाउंड जुटाए हैं।
सेवा, सामाजिक समरसता और साझा मूल्यों पर केंद्रित यात्रा
सरसंघचालक की यह यात्रा RSS के शताब्दी वर्ष के तहत सेवा, सामाजिक समरसता और साझा मूल्यों पर केंद्रित सभ्यतागत संवाद कार्यक्रम का हिस्सा है। लंदन प्रवास के दौरान उन्होंने विभिन्न धर्मों के प्रमुख नेताओं, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं तथा अन्य सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों से मुलाकात की।
अंतरधार्मिक संवाद के अंतर्गत उन्होंने श्री स्वामीनारायण मंदिर, विल्सडन, खालसा जत्था ब्रिटिश आइल्स गुरुद्वारा तथा लंदन के अन्य धार्मिक स्थलों का भी दौरा किया। यूके में हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों और भाषायी विविधता का प्रतिनिधित्व करने वाले 11 भाषा-समुदायों ने भी कार्यक्रम में भाग लिया।




