ओला, उबर और रैपिडो जैसी ऐप आधारित कैब सेवाओं में डायनेमिक प्राइसिंग के नाम पर बढ़ते किराये ने यात्रियों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या तकनीक की सुविधा का मतलब यह है कि जरूरत के समय आम आदमी को अपनी जेब ज्यादा ढीली करनी पड़े?
आज शहरों में ऑफिस जाना हो, रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट पहुंचना हो, अस्पताल जाना हो या बारिश से बचकर घर लौटना हो—ऐप आधारित कैब सेवाएं लाखों लोगों की रोजमर्रा की जरूरत बन चुकी हैं। मोबाइल पर कुछ क्लिक करते ही गाड़ी बुक करने की सुविधा ने यात्रा को आसान बनाया है। लेकिन इसी सुविधा के साथ एक ऐसी समस्या भी जुड़ी है, जो कई बार यात्रियों के लिए परेशानी का कारण बन जाती है—मांग बढ़ते ही किराये में अचानक भारी उछाल।
जरूरत बढ़ी तो किराया भी कई गुना!
कल्पना कीजिए कि सामान्य दिनों में किसी यात्रा का किराया 200 रुपये है। लेकिन तेज बारिश, भारी ट्रैफिक, त्योहार या ऑफिस छूटने के समय वही किराया 400, 500 या उससे भी अधिक दिखाई देने लगता है। यात्री के सामने दो ही विकल्प बचते हैं—महंगा किराया देकर यात्रा करे या अपनी जरूरत टाल दे।
डायनेमिक प्राइसिंग का तर्क यह है कि जब यात्रियों की मांग उपलब्ध गाड़ियों से ज्यादा हो जाती है, तो किराया बढ़ाकर अधिक ड्राइवरों को सवारी स्वीकार करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। आर्थिक दृष्टि से इस व्यवस्था का एक आधार है। समस्या तब पैदा होती है, जब कीमत में बढ़ोतरी इतनी ज्यादा हो कि यात्रियों को लगे कि उनकी मजबूरी का फायदा उठाया जा रहा है।
बारिश में फंसा व्यक्ति, अस्पताल जाने वाला मरीज, परीक्षा देने जा रहा विद्यार्थी या जरूरी ट्रेन पकड़ने वाला यात्री हमेशा यह इंतजार नहीं कर सकता कि किराया दोबारा कम हो जाए। ऐसी परिस्थितियों में उसके पास विकल्प सीमित होते हैं और महंगी सवारी स्वीकार करने का दबाव बढ़ जाता है।
क्या कहता है भारत का मौजूदा नियम?
केंद्र सरकार ने जुलाई 2025 में Motor Vehicle Aggregator Guidelines, 2025 जारी की थीं। इन दिशा-निर्देशों के तहत कैब एग्रीगेटर को संबंधित राज्य सरकार द्वारा निर्धारित बेस फेयर के मुकाबले अधिकतम दो गुना तक डायनेमिक किराया लेने की अनुमति दी गई है। ऑफ-पीक समय में किराया बेस फेयर से 50 प्रतिशत तक कम भी हो सकता है।
इसका मतलब यह है कि हर बार किराया दोगुना दिखना अपने आप में नियम का उल्लंघन साबित नहीं करता। लेकिन किराये की गणना, लागू बेस फेयर, अतिरिक्त शुल्क और संबंधित राज्य में लागू व्यवस्था की पारदर्शिता बेहद महत्वपूर्ण है।
इन दिशा-निर्देशों को लागू करने और जरूरत के अनुसार अतिरिक्त प्रावधान बनाने में राज्य सरकारों की भी भूमिका है। इसलिए केवल नियम बना देना पर्याप्त नहीं है; उनकी निगरानी और प्रभावी कार्रवाई भी जरूरी है।
मौसम और आपात जरूरत के समय अलग सुरक्षा क्यों नहीं?
बारिश, अत्यधिक गर्मी या सार्वजनिक परिवहन बाधित होने जैसी परिस्थितियों में यात्रियों की मांग अचानक बढ़ सकती है। इसी तरह देर रात, अस्पताल जाने या जरूरी यात्रा के समय भी लोगों के पास सीमित विकल्प होते हैं।
ऐसे समय में किराया बढ़ाने की एक तय सीमा होना आवश्यक है, लेकिन केवल अधिकतम सीमा हर समस्या का समाधान नहीं है। जरूरी है कि कंपनियां यह भी स्पष्ट करें कि किराया क्यों बढ़ा, बढ़ोतरी कितनी देर तक लागू रहेगी और उसमें से कितना हिस्सा ड्राइवर को मिलेगा।
सरकार को यह भी विचार करना चाहिए कि घोषित आपातकाल, प्राकृतिक आपदा या सार्वजनिक परिवहन बाधित होने जैसी स्थितियों में सामान्य पीक-ऑवर नियमों से अलग किराया-सुरक्षा लागू की जा सकती है या नहीं।
सुधार के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?
1. किराये में बढ़ोतरी की स्पष्ट सीमा
सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सामान्य पीक आवर्स, खराब मौसम और घोषित आपात स्थितियों के लिए स्पष्ट नियम हों। आपदा या गंभीर आपात स्थिति में अतिरिक्त सख्त सीमा लागू करने पर विचार किया जा सकता है।
2. बुकिंग से पहले पूरा किराया दिखाना
ऐप पर यात्री को बेस फेयर, दूरी, समय, टोल, अन्य शुल्क और डायनेमिक प्राइसिंग का अलग-अलग विवरण दिखना चाहिए। बुकिंग के बाद बिना यात्री की सहमति के किराया बढ़ाने की अनुमति नहीं होनी चाहिए, सिवाय पहले से स्पष्ट रूप से बताई गई वैध परिस्थितियों के।
3. अनुचित वसूली पर आर्थिक दंड
यदि जांच में यह साबित हो कि किसी कंपनी ने निर्धारित सीमा का उल्लंघन किया, गलत शुल्क लगाया या भ्रामक तरीके से यात्री पर अतिरिक्त भुगतान का दबाव बनाया, तो उल्लंघन की गंभीरता के अनुसार आर्थिक दंड लगाया जाना चाहिए। बार-बार उल्लंघन पर अधिक कठोर कार्रवाई भी होनी चाहिए।
4. यात्रियों के लिए आसान शिकायत व्यवस्था
ऐप में किराये से संबंधित शिकायत दर्ज करने का विकल्प स्पष्ट होना चाहिए। शिकायत की स्थिति, जांच का परिणाम और संभावित रिफंड की जानकारी यात्री को मिलनी चाहिए। गंभीर मामलों में राज्य परिवहन प्राधिकरण या उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था तक शिकायत पहुंचाने का रास्ता भी आसान होना चाहिए।
5. किराया तय करने वाले एल्गोरिदम की निगरानी
कंपनियों को नियामक प्राधिकरण के सामने यह बताने में सक्षम होना चाहिए कि किराया बढ़ाने के लिए किन कारकों का इस्तेमाल हुआ। नियमित ऑडिट से यह जांचा जा सकता है कि डायनेमिक प्राइसिंग निर्धारित नियमों के अनुरूप है या नहीं।
6. ड्राइवरों के हितों की सुरक्षा
इस समस्या का समाधान केवल किराया घटाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। ड्राइवर भी ईंधन, वाहन रखरखाव, ट्रैफिक और लंबे कामकाजी घंटों का खर्च उठाते हैं। यदि किराये पर सीमा लगाई जाती है, तो ड्राइवरों की उचित कमाई और कंपनियों की जवाबदेही के बीच संतुलन भी जरूरी है।
कंपनियों की जिम्मेदारी भी तय हो
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने कैब एग्रीगेटर कंपनियों को किराये की गणना, सर्ज प्राइसिंग और यात्रियों से वसूले जाने वाले शुल्क में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए स्व-नियामक उपाय सुझाए हैं। इनमें सर्ज शुल्क को बिल में स्पष्ट दिखाना और यात्रियों तथा ड्राइवरों को मूल्य निर्धारण की नीति समझाना शामिल है।
इससे स्पष्ट है कि चर्चा सिर्फ किराया कितना होना चाहिए, इस पर नहीं, बल्कि यह भी है कि किराया किस आधार पर तय हुआ और उसकी जिम्मेदारी किसकी है।
सुविधा जरूरी है, लेकिन उपभोक्ता का हित भी
ऐप आधारित कैब सेवाओं ने शहरों में परिवहन के विकल्प बढ़ाए हैं। इन सेवाओं से यात्रियों को सुविधा मिलती है और बड़ी संख्या में ड्राइवरों को रोजगार के अवसर भी मिलते हैं। इसलिए इन सेवाओं पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है, जिसमें तकनीक, बाजार और उपभोक्ता अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे।
मांग और आपूर्ति के आधार पर किराये में कुछ बदलाव समझ में आता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति बारिश, बीमारी, आपात जरूरत या परिवहन की कमी के कारण कैब लेने को मजबूर हो, तब उसकी परिस्थिति का अनुचित लाभ नहीं उठाया जाना चाहिए।
सरकार को मौजूदा नियमों के पालन की प्रभावी निगरानी करनी चाहिए, राज्यों को किराया-सुरक्षा पर स्पष्ट नीति बनानी चाहिए और जानबूझकर नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
आखिरकार, तकनीक का उद्देश्य लोगों की जिंदगी आसान बनाना है—उनकी मजबूरी को महंगा करना नहीं।




