उत्तर प्रदेश में शहरी परिवहन व्यवस्था को आधुनिक बनाने की तैयारी है। राज्य के 18 शहरों में 1,725 नई इलेक्ट्रिक बसें चलाने की योजना है। वहीं, लखनऊ में 265 करोड़ रुपये की लागत से आधुनिक इंटीग्रेटेड बस टर्मिनल बनाया जाएगा। इस परियोजना में यात्रियों के लिए एयरपोर्ट जैसी सुविधाएं विकसित करने और बसों के संचालन में निजी कंपनियों की भागीदारी की योजना है।
18 शहरों में चलेंगी एसी इलेक्ट्रिक बसें
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में प्रदेश के 18 शहरों में 1,725 नई वातानुकूलित इलेक्ट्रिक बसें चलाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इसका उद्देश्य शहरी परिवहन को बेहतर बनाना, प्रदूषण कम करना और यात्रियों को सुविधाजनक सफर उपलब्ध कराना है।
लखनऊ और कानपुर को मिलेंगी सबसे ज्यादा बसें
योजना के तहत लखनऊ और कानपुर में 300-300 बसें चलाई जाएंगी। वाराणसी को 250 और गोरखपुर को 150 बसें मिलेंगी। आगरा, गाजियाबाद, मेरठ और नोएडा (जेवर सहित) में 100-100 बसें संचालित होंगी।
वहीं, अयोध्या, प्रयागराज और मथुरा-वृंदावन को 50-50 बसें दी जाएंगी। अलीगढ़, बरेली, फिरोजाबाद, झांसी, मुरादाबाद, सहारनपुर और शाहजहांपुर में 25-25 बसें चलाने की योजना है।
राजधानी के वृंदावन योजना स्थित पी-4 पार्किंग क्षेत्र में लगभग 265 करोड़ रुपये की लागत से इंटीग्रेटेड बस टर्मिनल विकसित किया जाएगा। परियोजना सार्वजनिक-निजी भागीदारी यानी पीपीपी मॉडल पर तैयार होगी। इसका उद्देश्य इलेक्ट्रिक बसों के बढ़ते बेड़े के लिए अतिरिक्त संचालन केंद्र उपलब्ध कराना और यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देना है।
यात्रियों को मिलेंगी एयरपोर्ट जैसी सुविधाएं
प्रस्तावित टर्मिनल में बस बे, पार्किंग, इलेक्ट्रिक बसों के लिए चार्जिंग व्यवस्था, मरम्मत केंद्र और प्रशासनिक कार्यालय बनाए जाएंगे। यात्रियों के लिए टिकट काउंटर, पूछताछ केंद्र, प्रतीक्षालय और सामान रखने की सुविधा उपलब्ध कराने की योजना है।
इसके अलावा परिसर में रेस्टोरेंट, कॉफी शॉप, दुकानें, मेडिकल स्टोर, बैंकिंग सुविधाएं, एटीएम, सार्वजनिक शौचालय और टैक्सी स्टैंड जैसी सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी। इससे यात्रियों को बस पकड़ने के साथ-साथ अन्य जरूरी सेवाएं भी एक ही परिसर में मिल सकेंगी।
निजी कंपनियां खरीदेंगी और चलाएंगी बसें
नई इलेक्ट्रिक बसों का संचालन ग्रॉस कॉस्ट कॉन्ट्रैक्ट (जीसीसी) मॉडल पर किया जाएगा। इसके तहत निजी ऑपरेटर बसों की खरीद, चार्जिंग के लिए जरूरी उपकरणों की व्यवस्था, ड्राइवरों और तकनीकी कर्मचारियों की तैनाती तथा बसों के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी संभालेंगे।
अनुबंध की अवधि व्यावसायिक संचालन शुरू होने से 12 वर्ष निर्धारित की गई है। सरकार 9 मीटर की बस पर 35 लाख रुपये और 12 मीटर की बस पर 40 लाख रुपये तक अनुदान देगी। बसों का किराया सरकार तय करेगी, जबकि ऑपरेटरों को निर्धारित प्रदर्शन मानकों के आधार पर भुगतान किया जाएगा।
क्या होगा यात्रियों को फायदा?
इलेक्ट्रिक बसों की संख्या बढ़ने से शहरों में सार्वजनिक परिवहन के विकल्प बढ़ेंगे। वातानुकूलित बसों से यात्रियों को अधिक आरामदायक सफर मिलने की उम्मीद है। वहीं, लखनऊ में आधुनिक टर्मिनल बनने से बस संचालन, चार्जिंग और रखरखाव की व्यवस्था को व्यवस्थित करने में मदद मिल सकती है।
सरकार की इस पहल से शहरी परिवहन को स्वच्छ और सुविधाजनक बनाने के साथ-साथ बस संचालन, तकनीकी रखरखाव और संबंधित सेवाओं में रोजगार के अवसर बढ़ने की भी संभावना है।




