लखनऊ। जैन धर्मावलंबियों का महत्वपूर्ण क्षमावाणी पर्व आज, 27 सितंबर 2026 को लखनऊ में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। दशलक्षण महापर्व के समापन के बाद मनाए जाने वाले इस पर्व पर जैन समाज के लोग वर्षभर में मन, वचन और कर्म से जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए एक-दूसरे से क्षमा मांगेंगे और ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहकर मैत्री एवं सद्भाव का संदेश देंगे।
लखनऊ के विभिन्न जैन मंदिरों में इस अवसर पर धार्मिक कार्यक्रम, पूजा-अर्चना और प्रवचन आयोजित किए जा रहे हैं। आशियाना स्थित दिगंबर जैन मंदिर में भी उपाध्याय विहसंत सागर जी महाराज के सान्निध्य में विशेष धार्मिक कार्यक्रम और प्रवचन आयोजित होने की जानकारी सामने आई है।
क्या है क्षमावाणी पर्व?
क्षमावाणी जैन धर्म में क्षमा, आत्मशुद्धि और आत्मचिंतन का महत्वपूर्ण पर्व है। यह केवल किसी से औपचारिक रूप से माफी मांगने का अवसर नहीं, बल्कि अपने व्यवहार और कर्मों पर आत्ममंथन करने तथा दूसरों के प्रति मन में मौजूद द्वेष और कटुता को समाप्त करने की प्रेरणा देता है।
दिगंबर जैन परंपरा में क्षमावाणी दशलक्षण महापर्व के समापन के बाद मनाई जाती है। इस दिन लोग एक-दूसरे से अपने जाने-अनजाने अपराधों के लिए क्षमा मांगते हैं और दूसरों की गलतियों को भी क्षमा करने का भाव रखते हैं।
‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ का क्या है अर्थ?
क्षमावाणी के अवसर पर जैन समाज में ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहकर क्षमा मांगी जाती है। इसका भाव है कि यदि हमारे मन, वचन या कर्म से किसी को जाने-अनजाने कोई कष्ट पहुंचा हो तो उसके लिए हम क्षमा चाहते हैं।
इसके साथ ही व्यक्ति दूसरों को भी हृदय से क्षमा करने का संकल्प लेता है। इस परंपरा का उद्देश्य मन में जमा क्रोध, अहंकार और द्वेष को दूर कर आपसी मैत्री और सद्भाव को बढ़ाना है।
‘मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूं, सभी जीव मुझे क्षमा करें। मेरा सभी प्राणियों के प्रति मैत्री भाव है और किसी से मेरा वैर नहीं है।’
यही क्षमावाणी का मूल भाव माना जाता है।
दशलक्षण महापर्व से क्या है संबंध?
दिगंबर जैन परंपरा में दशलक्षण महापर्व दस दिनों तक चलने वाला महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व है। इसमें उत्तम क्षमा सहित दस धर्मों पर मनन और साधना की जाती है।
दशलक्षण के दौरान व्यक्ति अपने भीतर के क्रोध, अहंकार, छल, लोभ और अन्य विकारों पर आत्मचिंतन करता है। इसके समापन के बाद आने वाला क्षमावाणी पर्व इस आत्मचिंतन को व्यवहार में उतारने का अवसर देता है।
यानी यह पर्व केवल स्वयं की गलतियों को पहचानने तक सीमित नहीं है, बल्कि दूसरों से क्षमा मांगने और दूसरों को क्षमा करने की भावना को भी मजबूत करता है।
जैन धर्म में क्षमा को क्यों माना गया है महत्वपूर्ण?
जैन दर्शन में उत्तम क्षमा को दशलक्षण धर्म का पहला धर्म माना गया है। क्षमा का अर्थ गलत और सही के बीच अंतर को समाप्त करना नहीं है। इसका उद्देश्य मन में क्रोध और वैरभाव को लंबे समय तक बनाए रखने के बजाय उससे ऊपर उठना है।
क्षमा व्यक्ति को आत्मसंयम और आत्मशुद्धि की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
आज के समय में और भी प्रासंगिक है क्षमावाणी का संदेश
आज के दौर में छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों में तनाव और मनमुटाव पैदा हो जाता है। परिवार, मित्रता, समाज और कार्यस्थल—हर जगह संवाद की कमी और पुरानी नाराजगी रिश्तों को प्रभावित कर सकती है।
ऐसे समय में क्षमावाणी का संदेश महत्वपूर्ण हो जाता है। यह हमें याद दिलाता है कि गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं है और क्षमा मांगना रिश्तों को बचाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है।
यह पर्व हमें सिखाता है—
- अपनी गलती स्वीकार करने का साहस रखें।
- जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगें।
- दूसरों की गलतियों को क्षमा करने का प्रयास करें।
- क्रोध और द्वेष को मन में लंबे समय तक न रखें।
- सभी जीवों के प्रति मैत्री और करुणा का भाव रखें।
- अपने विचार, वचन और कर्मों का आत्मनिरीक्षण करें।
लखनऊ में धार्मिक आयोजनों का माहौल
क्षमावाणी पर्व के अवसर पर लखनऊ के विभिन्न जैन मंदिरों और समाज से जुड़े स्थानों पर धार्मिक आयोजन किए जा रहे हैं। श्रद्धालु पूजा-अर्चना, प्रवचन और अन्य धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होकर क्षमा और आत्मशुद्धि का संदेश ग्रहण करेंगे।
आशियाना स्थित दिगंबर जैन मंदिर में भी उपाध्याय विहसंत सागर जी महाराज के सान्निध्य में विशेष कार्यक्रम और प्रवचन आयोजित किए जाने की जानकारी है। इन आयोजनों में श्रद्धालुओं को क्षमावाणी के आध्यात्मिक महत्व और जीवन में क्षमा के भाव को अपनाने का संदेश दिया जाएगा।
क्षमावाणी का मूल संदेश
क्षमावाणी हमें यह समझने का अवसर देती है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए केवल दूसरों की गलतियां देखना जरूरी नहीं, बल्कि समय-समय पर अपने भीतर भी झांकना जरूरी है।
किसी से क्षमा मांगना और किसी को हृदय से क्षमा करना मन के बोझ को कम करने की दिशा में एक कदम हो सकता है। यही कारण है कि क्षमावाणी को केवल एक धार्मिक परंपरा के रूप में नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, मैत्री और सद्भाव का संदेश देने वाले पर्व के रूप में भी देखा जाता है।
क्षमावाणी संदेश
“मिच्छामि दुक्कड़म्।
यदि मेरे मन, वचन या कर्म से किसी भी जीव को जाने-अनजाने कोई कष्ट पहुंचा हो तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूं। मैं भी सभी जीवों को क्षमा करता हूं और सभी के प्रति मैत्री भाव रखता हूं।”
क्षमावाणी पर्व का यही संदेश है—
क्षमा करें, क्षमा मांगें और मन में किसी के प्रति वैर न रखें।




